Thursday, 12 October 2017

लक्ष्मी बुलाने से नहीं आती

लक्ष्मी बुलाने से नहीं आती 
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दीपावली की पूजा सामान्य जन में सुख -समृद्धि और धन के लिए होती है ।सभी पूजा करके सीधे धन चाहते हैं ,सभी चाहते हैं लक्ष्मी उनके घर जाएं और बैठ जाएं ।दुनियाभर के सुख और समृद्धि उन्हें मिल जाए ।इसके लिए दीपावली पर गणेश लक्ष्मी लाकर पूजा करते हैं ।परिणाम कुछ संदिग्ध होता है ,जिसको आने वाले साल कुछ लाभ हुआ वह गणेश ,लक्ष्मी की कृपा मान लिया ,जिसे नहीं हुआ अपने भाग्य को दोष दे लिया ,की जब भाग्य में ही नहीं तो लक्ष्मी गणेश कहाँ से दे देंगे ।है ना हास्यास्पद ,फिर आपकी पूजा का क्या हुआ ,उसका परिणाम कहाँ गया ।कोई नहीं सोचता
अरे भाई कुछ भी कर लो मिलेगा उतना ही जितना भाग्य में होगा ,भाग्य का भी पूरा किसी को नहीं मिलता ।सब कोशिस धन के लिए करते हैं जबकि मिलता भाग्य जितना भी नहीं क्योकि भाग्य के धन को रोका जाता है नकारात्मक शक्तियों द्वारा ,फिर कितने भी उपाय करो धन के लिए नहीं मिलेगा।उपाय नकारात्मक शक्तियों के लिए करो की भाग्य का तो पूरा मिले।लक्ष्मी के पीछे भागने का कोई फायदा नहीं वो आएगी तब ना जब ये नकारात्मक शक्तियां आने देंगी और रुकावट नहीं बनेंगी ।उपाय करो इन्हें हटाने के ।सीधे लक्ष्मी को बुलाकर कोई फायदा नहीं होता ,उनका मार्ग साफ़ करना जरूरी है जिससे आपके भाग्य में उनकी जितनी मात्रा है वह सके ।रास्ता दीजिये वह तो खुद जायेगी ,सीधे बुलाइये नहीं उन्हें लाने का प्रयास कीजिये ।पूजने से वह नहीं आएगी प्रयास करने और रास्ता बनाने से वह आएगी
अधिकतर ज्योतिषी ,तांत्रिक और पंडित को खुद भाग्य का पूरा नहीं मिलता ,जबकि वह दूसरों को लक्ष्मी प्राप्ति के उपाय बताते फिरते हैं ।रोज हजारों पोस्ट दीपावली प्रयोगों के चेपे जा रहे ।लोग पागल हो रहे प्रयोग करने और अमीर बनने को ।नेट पर और किताबों में लक्ष्मी प्राप्ति के हजारों प्रयोग पड़े हैं ,कितने इनसे अमीर हो गए ।जो होते हैं अपने प्रयासों से ,भाग्य से अथवा धन सम्बन्धी नकारात्मक ऊर्जा के प्रभाव से मुक्त होकर
इसलिए उपाय जरूर कीजिये पर अँधेरे को ,नकारात्मकता को ,बाधाओं को हटाने के ,रास्ता साफ कीजिये लक्ष्मी के आने का ,रास्ता बनाइये उन्हें आने के लिए ।रास्ता ही नहीं होगा तो वो आएगी कहाँ से ।सीधे उन्हें बुलाकर क्या होगा ,रास्ता दीजिये वह खुद जायेगी
लक्ष्मी केवल बुलाने से नहीं आएगी ।बुलाने को तो करोड़ों हाथ रोज उठते हैं ,करोड़ों रोज मंदिरों ,घरों में सर पटकते हैं ,सब लक्ष्मी को ही बुलाते हैं पर कितने के यहाँ आती है।यह दीपावली नकारात्मकता हटाने ,अँधेरा दूर करने ,साफ़ सफाई और कर्म संयोजित करने का पर्व है ।भयानक अँधेरी रात को दीपक से खुद के लिए राह करने का पर्व है ।जगमग तो तब होगा जब कर्म करके ,नकारात्मकता हटाके इसे प्रकाशित करेंगे।कोशिस कीजिये अपने अंदर और घर की नकारात्मक ऊर्जा दूर करने का ।लक्ष्मी आपके भाग्यानुसार खुद जायेगी .......( व्यक्तिगत विचार ) ...............................हर हर महादेव

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लक्ष्मी-श्री लक्ष्मी और महालक्ष्मी

::::::::::::लक्ष्मी-लक्ष्मी और लक्ष्मी :: कौन हैं ये लक्ष्मी और महालक्ष्मी :::::::::::::
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हिन्दू धर्म में लक्ष्मी जी की बड़ी महत्ता है |आधुनिक युग में इनके बिना तो अब काम ही नहीं चलने वाला |हर जगह बस लक्ष्मी जी का ही बोलबाला है ,हर कोई बस लक्ष्मी ही पाना चाहता है |पर वास्तव में यह लक्ष्मी है कौन ,सभी द्वारा चाही जाने वाली लक्ष्मी और विष्णु की पत्नी लक्ष्मी में क्या कोई अंतर है ,क्या विष्णु का पैर दबाने वाली लक्ष्मी भी वही हैं जो धन की देवी हैं ,क्या वही लक्ष्मी त्रिदेव के एक रूप विष्णु की शक्ति हैं या इनमे कोई अंतर है |
कथाओं के अनुसार परम शक्ति ,परम आत्मा ,आदि तत्व ने जब सृष्टि की इच्छा की तो उसके संचालन के लिए स्वयं को तीन अंशों में उत्पन्न किया |ब्रह्मा-विष्णु और महेश ,,इनके साथ परम तत्व की शक्ति भी तीन भागों में हो तीनो अंशों के साथ जुडी |विष्णु के साथ महालक्ष्मी ,ब्रह्मा के साथ महा सरस्वती और महेश के साथ महाकाली |विष्णु के साथ जुडी महालक्ष्मी आदि शक्ति हैं जो विष्णु के जगत पालन की सहयोगी हैं और इन्हें भुवनेश्वरी और अन्नपूर्णा भी कहा जाता है |इनका केवल धन से कोई लेना देना नहीं है ,अपितु यह सर्व सम्पदा की मालकिन हैं और जगत का पालन इनकी ही शक्ति से विष्णु संपन्न करते हैं |यही महालक्ष्मी विष्णु [आत्म तत्व]के साथ अनाहत में निवास करते हुए जीवमात्र का सञ्चालन करती हैं |
समुद्र मंथन की कथा के अनुसार ,मंथन से लक्ष्मी की उत्पत्ति हुई ,जिनके योग्य किसी देवता के न होने पर उन्हें विष्णु जी को प्रदान किया गया |यह लक्ष्मी ,धन की देवी मानी जाती हैं और समस्त धन-संपत्ति इनके अधीन माने जाते हैं |प्रकारांतर से यह धरती से उत्पन्न सभी संपत्तियों की स्वामिनी हैं अतः धन की देवी हैं | लक्ष्मी अर्थात श्री और समृद्धि की उत्पत्ति। कुछ लोग इसे सोने (गोल्ड) से जोड़ते हैं। माना जाता है कि जिस भी घर में स्त्री का सम्मान होता है, वहां समृद्धि कायम रहती है।इन्हें ही कमला भी कहा जाता है जो दश महाविद्या के अंतर्गत एक महाविद्या हैं |अन्य कथा के अनुसार इन लक्ष्मी ने जब श्री विद्या त्रिपुर सुंदरी की आराधना की , तो त्रिपुरा ने इन्हें अपनी उपाधि श्री से इन्हें सुशोभित किया [प्रदान किया ],तब से लक्ष्मी जी श्री लक्ष्मी कहलाने लगी |महालक्ष्मी को श्री महालक्ष्मी नहीं कहा जाता ,वह तो स्वयं श्री हैं और श्री प्रदान करने वाली हैं ,वह तो आदि शक्ति हैं |
इन दो लक्ष्मियों के अतिरिक्त एक अन्य लक्ष्मी भी हुई हैं | महर्षि भृगु की पत्नी ख्याति के गर्भ से एक त्रिलोक सुन्दरी कन्या उत्पन्न हुई जिसका नाम लक्ष्मी था और जिसने भगवान विष्णु से विवाह किया। यही लक्ष्मी भगवान् विष्णु की सदैव सेवा करती रहती हैं ,और इन्हें ही विष्णु जी का पैर दबाते हुए देखा जाता है |
एक कथा के अनुसार महर्षि भृगु ने एक बार क्रुद्ध हो विष्णु जी की छाती पर पैर से मारा था ,तब लक्ष्मी जी ने समस्त ब्राह्मणों को श्राप दिया था की वे दरिद्र हो जायेंगे |भृगु जी की पुत्री लक्ष्मी ,अपने पिता को श्राप दे नहीं सकती थी ,,महालक्ष्मी आदि शक्ति हैं ,अपनी ही सृष्टि को वे श्रापित कर नहीं सकती तो यहाँ सीधा सा अर्थ है की जो लक्ष्मी समुद्र मंथन से निकली थी उन्होंने ब्राह्मणों को श्राप दिया था ,जिसके प्रति उत्तर में महा सरस्वती ने ब्राह्मणों को महा ज्ञानी होने का वरदान दिया था और कहा था ,ब्राह्मणों की श्रेष्ठता सदैव रहेगी ,चाहे कोई कितना ही धनवान हो और लक्ष्मी को खुद चलकर ब्राह्मणों के पास आना होगा |

हम सभी लक्ष्मी -लक्ष्मी ,हाय लक्ष्मी करते रहते हैं ,पर लक्ष्मी को पूरी तरह नहीं जानते ,जबकि हमें लक्ष्मी ,श्री लक्ष्मी और महालक्ष्मी को जानना चाहिए |भृगु जी की पुत्री लक्ष्मी की उपासना से सेवा भाव ,श्रद्धा, संतुष्टि ,सुख प्राप्त होता है |श्री लक्ष्मी की उपासना से धन -समृद्धि प्राप्त होता है और महालक्ष्मी की उपासना से सब कुछ प्राप्त होता है जो भी जीवमात्र के पालान -पोषण ,सुख-सुविधा ,भोग-विलास के लिए आवश्यक है |...........[व्यक्तिगत चिंतन]............................................................हर-हर महादेव 

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Monday, 9 October 2017

कर्ण पिशाचिनी साधना [Karn Pishachini Sadhna ] - ४

कर्ण पिशाचिनी साधना [Karn Pishachini Sadhna ]
===============[[ चतुर्थ मंत्र - सात्विक पद्धति ]]
कर्ण पिशाचिनी मूलतः वाम मार्ग द्वारा साधित होने वाली एक अति उग्र तामसिक शक्ति है जो वाम मार्ग से शीघ्र सिद्ध होती है ,तथापि इसके सात्विक रूप भी हैं और यह सिद्ध भी होती है इन पद्धतियों से यद्यपि इनमे समय अधिक लग सकता है |हमने अपने पहले के तीन लेख में अघोर क्रियागत ,वाम मार्गीय साधना और सात्विक साधना के बारे में सामान्य जानकारी लिखी है |अब इस अंक में हम कर्ण पिशाचिनी की एक और सात्विक साधना पद्धति अपने blog पाठकों के लिए लिख रहे हैं |कर्ण पिशाचिनी है क्या इसे जाने बिन ,बिना गुरु आज्ञा ,बिन ठीक से समझे ,बिना समुचित सुरक्षा के साधना न करें |हम मात्र जानकारी उपलब्ध करा रहे |कुछ गोपनीय तकनिकी गोपनीय यहाँ भी हैं जिन्हें साधक को अपने गुरु से समझना होगा |कर्ण पिशाचिनी है क्या इसे जानने के लिए हमारे ब्लॉग का "" कर्ण पिशाचिनी "" लेख देखें |
स्थान - साधक को कर्ण पिशाचिनी की साधना घर में नहीं करनी चाहिए |घर में इसकी साधना करने पर घर का वातावरण तो दूषित होता ही है साथ ही सिद्धि भी बहुत देर से प्राप्त होती है |घर में सिद्धि का प्रयास प्रारम्भ करते ही अनेको कष्ट उत्पन्न होने लगते हैं हालांकि सिद्ध होने पर नियंत्रित हो जाने पर सबकुछ ठीक हो जाता है किन्त इतने दिनों में ही उथल पुथल सबकुछ अस्त व्यस्त ककर सकती है |इसलिए साधना तामसी वातावरण का एकांत स्थान ,या श्मशान या एकांत में स्थित वट वृक्ष के आसपास करना उपयुक्त होता है |
मन्त्र - ॐ कर्ण पिशाचिनी श्मशानवासिनी महादेव्यै रतिप्रिये काल ज्ञान ज्ञानिनी स्वप्न कामेश्वरी पद्मावती त्रैलोक्य वार्ता कथय कथय स्वाहा |
वस्त्र - रक्तिम लाल या काला
आसन - लाल ,रक्तिम या काला कम्बल
दिशा - पूर्व मुख
माला - रुद्राक्ष या लाल मूंगे की माला
सामग्री - - काला कपडा ,लकड़ी का पटरा ,कांसे की थाल ,पूजन सामग्री ,मूर्ती ,कर्ण पिशाचिनी यन्त्र ,दीपक तेल का ,बाजोट ,अगर बत्ती |
तिलक - सिन्दूर का
तिथि और समय - अमावश्या या शुक्ल पक्ष की द्वितीया की अर्धरात्रि के बाद
मंत्र संख्या - सवा लाख
हवन संख्या - जप संख्या का दसवां भाग
विधि -
-------- जब तक नीरव शान्ति रहे तब तक जप करें ,उसके बाद दिन भर मानसिक ध्यान में रहें |शैया साधना स्थल पर ही बनानी चाहिए |साधक को फलों एवं दूध आदि पर रहना चाहिए |स्थान वर्जित है और मंत्र जप के समय निर्वस्त्र जप करना चाहिए |पूर्णाहुति के बाद किसी कुँवारी कन्या को भोजन करानी चाहिए ,जो रजस्वला नहीं हो |पूर्णाहुति हवन अनुष्ठान में खीर ,खांड ,पूरी ,शराब [देशी ], गुग्गल ,लौंग ,इतर ,अंडे आदि का प्रयोग किया जाता है |इसके बाद स्त्री को लाल वस्त्र एवं श्रृंगार सामग्री अर्पित की जाती है |साधना समय लगातार अगरबत्ती जलती रहनी चाहिए |
प्रस्तुत साधना में मल -मूत्र आदि का उपयोग तो नहीं है किन्तु कर्ण पिशाचिनी एक तामसी शक्ति है जो अशुद्धि पसंद करती है अतः पूर्ण तामसिकता और काम भाव से ही साधना होनी चाहिए |साधना के अंतिम दिन अथवा पहले भी कर्ण पिशाचिनी प्रकट हो सकती है ,ऐसे में इसे वचन बढ किया जाना चाहिए |ये तमोगुणी होती हैं अतः वचनबद्ध होकर वचनों का पालन करना इनकी अनिवार्य विवशता है |इनकी व्यवस्था में वचन भंग करना कठोर दंडनीय अपराध है |साधना समय अनेक भयानक अनुभव भी हो सकते हैं किन्तु साधक को डरना नहीं चाहिए |इसलिए कहा जाता है की कमजोर हृगे वाले यह साधना न करें |साधना समय आसन समेटना नहीं चाहिए |वह लगातार बिछा ही रहे |साधना समय ग्वारपाठा अथवा घृतकुमारी को साथ रखना उपयुक्त होता है जो कर्ण पिशाचिनी की उग्रता भी कम करता है और विघ्न भी कम उत्पन्न होने देता है |पिशाचिनी प्रकट तो यौवना रूप में होती है किन्तु यह एक ऊर्जा है जिसका निश्चित आकार नहीं है ऐसे में यह निश्चित स्वरुप ,प्रकृति और आकृति की मांग करती है ,ऐसे में साधक जिस रूप में उसे प्राप्त करना चाहता है उस स्वरुप की उसके पास कमी हो जाती है |पिशाचिनी साकार रूप में नहीं रहती किन्तु फिर भी उस स्वरुप यथा माता ,बहन ,पत्नी ,पुत्री अथवा प्रेमिका जो भी माँगा गया हो उसे यह साधक के साथ नहीं रहने देती अथवा समाप्त कर देती है |
विशेष चेतावनी

========== उपरोक्त साधना पद्धति मात्र जानकारी के उद्देश्य से दिया जा रहा है |जैसा की शास्त्रों में ,किताबों में कर्ण पिशाचिनी की साधना दी हुई है ,हम भी ब्लॉग और पेज पर मात्र जानकारी देने के उद्देश्य से इसे प्रकाशित कर रहे हैं |मात्र इस लेख के आधार पर साधना न करें |साधना पूर्व अपने गुरु से अनुमति लें और किसी सिद्ध काली साधक से सुरक्षा कवच बनवाकर जरुर धारण करें ,जो ऐसा हो की सुरक्षा भी करे औए पिशाचिनी के आगमन को रोके भी नहीं |योग्य ग्यानी से समस्त प्रक्रिया और मंत्रादी समझ लें ,जांच लें |किसी भी हानि अथवा परेशानी के लिए हम जिम्मेदार नहीं होंगे |धन्यवाद |...................................................................हर-हर महादेव 

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कर्ण पिशाचिनी साधना [Karn Pishachini Sadhna ] - ३

कर्ण पिशाचिनी साधना [Karn Pishachini Sadhna ]
=============== [तृतीय मंत्र - वाम मार्ग ]
हमने अपने ब्लॉग के पूर्व के लेखों में कर्ण पिशाचिनी है क्या यह बता रखा है और इसकी दो प्रकार की साधनाएं सात्विक तथा अघोर क्रियागत ,दो भिन्न लेखों में प्रकाशित की हैं |अघोर क्रियागत साधना भी वाम मार्गीय साधना ही है किन्तु वाम मार्ग में ही ऐसी प्रक्रिया भी है जिसमे मल मूत्र भक्षण आवश्यक नहीं ,यद्यपि अशुद्ध यहाँ भी रहना होता है और लगभग प्रक्रिया वैसी ही अपनाई जाती है |बिन मल मूत्र भक्षण के निम्न साधना की जा सकती है |पूर्व में दी गयी अघोर क्रियागत साधना सी ही यह भी साधना है ,जहाँ अंतर है वहां अलग पद्धति लिखी जा रही है |दोनों पद्धतियों का सूक्ष्म अवलोकन कर साधना की जा सकती है |साधना बिन गुरु अनुमति ,बिना सुरक्षा कवच ,बिना पूर्ण प्रक्रिया योग्य ज्ञानी से समझे भूलकर भी नहीं करनी चाहिए |
मन्त्र -
------- ॐ ह्रीं कर्ण पिशाचिनी अमोघ सत्य वादिनी मम करणे अवतर अवतर सत्यं कथय कथय अतीतानागतवर्त्तमान दर्शय दर्शय ऐं ह्रीं कर्ण पिशाचनी स्वाहा |
सामग्री -
---------- २४ हड्डियों की दो मालाएं ,लाल कपडा ,लाल या काला उनी आसन बाजोट ,९ बड़े बड़े दीपक सरसों तेल से भरे हुए ,मूर्ती ,कर्ण पिशाचिनी यन्त्र ,पूजन सामग्री
स्थान - निर्जन ,एकांत स्थान ,वट वृक्ष के नीचे अथवा श्मशान
--------
विधि -
------- इस साधना में कृष्ण नवमी की रात्री से अमावश्या की रात्री तक जप किया जाता है |२४ हड्डियों की एक माला पर जप होता है और दूसरी माला साधक के गले में होती है |९ दीपक चारो तरफ जलाए जाते हैं और दक्षिण दिशा की तरफ मुंह करके जप किया जाता है |जप अर्ध रात्री से रात रहने तक किया जाता है |जप पूर्व मूर्ती ,यन्त्र की पूजा की जाती है और मांस मदिरा अर्पित की जाती है |जप पूर्ण निर्वस्त्र अवस्था में होता है |मल मूत्र विसर्जन वहीँ आसपास करना होता है और शयन भी वहीँ किया जाता है |दातुन मंजन नहीं किया जाता और जूठे बर्तन में ही भोजन किया जाता है |गायत्री अथवा शक्ति की उपासना आदि भूलकर भी नहीं होनी चाहिए ,न ही मंदिर आदि में प्रवेश करना चाहिए |शेष पद्धति अघोर क्रियागत साधना जैसी |
विशेष चेतावनी

========== उपरोक्त साधना पद्धति मात्र जानकारी के उद्देश्य से दिया जा रहा है |जैसा की शास्त्रों में ,किताबों में कर्ण पिशाचिनी की साधना दी हुई है ,हम भी ब्लॉग और पेज पर मात्र जानकारी देने के उद्देश्य से इसे प्रकाशित कर रहे हैं |मात्र इस लेख के आधार पर साधना न करें |साधना पूर्व अपने गुरु से अनुमति लें और किसी सिद्ध काली साधक से सुरक्षा कवच बनवाकर जरुर धारण करें ,जो ऐसा हो की सुरक्षा भी करे औए पिशाचिनी के आगमन को रोके भी नहीं |योग्य ग्यानी से समस्त प्रक्रिया और मंत्रादी समझ लें ,जांच लें |किसी भी हानि अथवा परेशानी के लिए हम जिम्मेदार नहीं होंगे |धन्यवाद |...................................................................हर-हर महादेव 

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कर्ण पिशाचिनी साधना [Karn Pishachini Sadhna ] - २

कर्ण पिशाचिनी साधना [Karn Pishachini Sadhna ]
================[ द्वितीय मंत्र - सात्विक क्रियागत ]
कर्ण पिशाचिनी मूलतः वाम मार्ग द्वारा साधित होने वाली एक अति उग्र तामसिक शक्ति है जो वाम मार्ग से शीघ्र सिद्ध होती है ,तथापि इसके सात्विक रूप भी हैं और यह सिद्ध भी होती है इन पद्धतियों से यद्यपि इनमे समय अधिक लग सकता है |हमने अपने पहले के लेख में अघोर क्रियागत वाम मार्गीय साधना के बारे में सामान्य जानकारी लिखी है |अब इस अंक में हम कर्ण पिशाचिनी की सात्विक साधना पद्धति अपने blog पाठकों के लिए लिख रहे हैं |कर्ण पिशाचिनी है क्या इसे जाने बिन ,बिना गुरु आज्ञा ,बिन ठीक से समझे ,बिना समुचित सुरक्षा के साधना न करें |हम मात्र जानकारी उपलब्ध करा रहे |कुछ गोपनीय तकनिकी गोपनीय यहाँ भी हैं जिन्हें साधक को अपने गुरु से समझना होगा |कर्ण पिशाचिनी है क्या इसे जानने के लिए हमारे ब्लॉग का "" कर्ण पिशाचिनी "" लेख देखें |
मंत्र - ॐ नमः कर्ण पिशाचिन्य अमोघ सत्यवादिनी मम करणे अवरावतर अतीतानागतवर्तमानानि दर्शय मम भविष्यं कथय कथय ह्रीं कर्ण पिशाचिनी |
स्थान - तामसी वातावरण का एकांत स्थान ,या श्मशान या एकांत में स्थित वट वृक्ष 
वस्त्र - रक्तिम लाल या काला
आसन - लाल ,रक्तिम या काला कम्बल
दिशा - दक्षिणोन्मुखि
माला - रुद्राक्ष या लाल मूंगे की माला
सामग्री -  काला कपडा ,लकड़ी का पटरा ,कांसे की थाल ,पूजन सामग्री ,मूर्ती ,कर्ण पिशाचिनी यन्त्र ,दीपक तेल का
तिलक - सिन्दूर का
तिथि और समय - अमावश्या या शुक्ल पक्ष की द्वितीया की अर्धरात्रि के बाद
मंत्र संख्या - सवा लाख
हवन संख्या - जप संख्या का दसवां भाग
विधि -
-------- जब तक नीरव शान्ति रहे तब तक जप करें ,उसके बाद दिन भर मानसिक ध्यान में रहें |शैया साधना स्थल पर ही बनानी चाहिए |साधक को फलों एवं दूध आदि पर रहना चाहिए |स्थान वर्जित है और मंत्र जप के समय निर्वस्त्र जप करना चाहिए |पूर्णाहुति के बाद किसी कुँवारी कन्या को भोजन करानी चाहिए ,जो रजस्वला नहीं हो |पूर्णाहुति अनुष्ठान में खीर ,खांड ,पूरी ,शराब [देशी ], गुग्गल ,लौंग ,इतर ,अंडे आदि का प्रयोग किया जाता है |इसके बाद स्त्री को लाल वस्त्र एवं श्रृंगार सामग्री अर्पित की जाती है |साधना के अंतिम दिन अथवा पहले भी कर्ण पिशाचिनी प्रकट हो सकती है ,ऐसे में इसे वचन बढ किया जाना चाहिए |ये तमोगुणी होती हैं अतः वचनबद्ध होकर वचनों का पालन करना इनकी अनिवार्य विवशता है |पिशाचिनी प्रकट तो यौवना रूप में होती है किन्तु यह एक ऊर्जा है जिसका निश्चित आकार नहीं है ऐसे में यह निश्चित स्वरुप ,प्रकृति और आकृति की मांग करती है ,ऐसे में साधक जिस रूप में उसे प्राप्त करना चाहता है उस स्वरुप की उसके पास कमी हो जाती है |पिशाचिनी साकार रूप में नहीं रहती किन्तु फिर भी उस स्वरुप यथा माता ,बहन ,पत्नी ,पुत्री अथवा प्रेमिका जो भी माँगा गया हो उसे यह साधक के साथ नहीं रहने देती अथवा समाप्त कर देती है |
प्रस्तुत साधना में मल -मूत्र आदि का उपयोग तो नहीं है किन्तु कर्ण पिशाचिनी एक तामसी शक्ति है जो अशुद्धि पसंद करती है अतः पूर्ण तामसिकता और काम भाव से ही साधना होनी चाहिए |यह पद्धति अनुष्ठानों से प्रेरित है अतः संकल्प लेकर निश्चित संख्या में रोज जप किया जाना बेहतर है |जप समय ध्यान पूरी तरह एकाग्र हो और व्यक्ति को निर्भय होना चाहिए |यदि वास्तविक प्रत्यक्षीकरण की अभिलाषा है और अनुष्ठान के दौरान प्रत्यक्षीकरण नहीं होता तो ,अनुष्ठान के बाद भी मंत्र जप यथा नियम जारी रखा जा सकता है |अनुष्ठान पूर्ण होने पर व्यक्ति को घटनाओं की सूचना मिलने लगती है |
विशेष चेतावनी

========== उपरोक्त साधना पद्धति मात्र जानकारी के उद्देश्य से दिया जा रहा है |जैसा की शास्त्रों में ,किताबों में कर्ण पिशाचिनी की साधना दी हुई है ,हम भी ब्लॉग और पेज पर मात्र जानकारी देने के उद्देश्य से इसे प्रकाशित कर रहे हैं |मात्र इस लेख के आधार पर साधना न करें |साधना पूर्व अपने गुरु से अनुमति लें और किसी सिद्ध काली साधक से सुरक्षा कवच बनवाकर जरुर धारण करें ,जो ऐसा हो की सुरक्षा भी करे औए पिशाचिनी के आगमन को रोके भी नहीं |योग्य ग्यानी से समस्त प्रक्रिया और मंत्रादी समझ लें ,जांच लें |किसी भी हानि अथवा परेशानी के लिए हम जिम्मेदार नहीं होंगे |धन्यवाद |...................................................................हर-हर महादेव 

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कर्ण पिशाचिनी साधना - १

कर्ण पिशाचिनी साधना
===============[प्रथम मंत्र -अघोर क्रियागत ]
कर्ण पिशाचिनी का नाम तंत्र जगत में जाना पहचाना है |सामान्य जन भी भूत -भविष्य बताने वाली सिद्धि के रूप में इसे जानते हैं ,यद्यपि यह भविष्य नहीं बता सकती |भविष्य के कथन साधक के पूर्वानुमान और तुक्के होते हैं जो कभी सही ,कभी गलत हो सकते हैं |हाँ यह पैशाचिक साधना से उत्पन्न शक्ति भूत और वर्त्तमान ठीक ठीक बता देती है अतः इस आधार पर व्यक्ति भविष्यवक्ता बन बैठता है,किन्तु भविष्य कथन केवल इस शक्ति के आधार पर सही नहीं होता |या तो सटीक अनुमान हो अथवा ज्योतिष का ज्ञान हो तभी भविष्य सही हो सकता है |कर्ण पिशाचिनी जितनी जल्दी आएगी उसकी शक्ति उतनी ही कम होगी |देर से आने पर शक्ति अधिक होती है |कर्ण पिशाचिनी के अनेक मंत्र और पद्धतियाँ हैं |कुछ सात्विक और कुछ अघोर क्रियागत |हम इसमें से कुछ पद्धतियों पर लिखते हैं और इस अंक में हम अघोर क्रियागत एक मन्त्र और उसकी पद्धति लिखते हैं |
मंत्र - ॐ ह्रीं कर्ण पिशाचिनी अमोघ सत्यवादिनी मम् करणे अवतर अवतर सत्यं कथय कथय अतीतानागतं वर्तमानं दर्शय दर्शय ऐं ह्रीं ह्रीं कर्ण पिशाचिनी स्वाहा |
------
स्थान - श्मशान
--------
वस्त्र - लाल या काला
-------
आसन - काला ,लाल या रक्त के रंग का कम्बल
---------
दिशा - दक्षिणोन्मुखि
--------
माला - अस्थियों की [पहनने के लिए २१ की ,जपने के लिए १४१ की ]
------
दीपक - तीन [सरसों का तेल पूरा भरा रहे ] अथवा ११ दीपक और चमेली का तेल [अपनी पद्धति अनुसार ]
--------
समय
-------- कृष्ण त्रयोदशी की अर्ध रात्री से
मंत्र संख्या
-------------- अर्ध रात्री से भोर तक प्रतिदिन 
सामग्री
---------- काला कपड़ा ,लकड़ी का पटरा ,कांसे की थाली ,मल -मूत्र ,मूर्ती ,कर्ण पिशाचिनी यन्त्र ,
विधि
-------- कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी से अमावस तक इसका प्रयोग है |हर रात्री में १३  तिथि से अमावस्या तक जब तक नीरव शान्ति रहे तब तक जप करना चाहिए |दिन में मानसिक ध्यान में रहना चाहिए |इस साधना में साधक को कृष्ण तृतीया से ही नहाना -धोना ,संध्या वंदन ,मुख शोधन अर्थात दातुन मंजन सब बंद कर देना चाहिए |जूठे बर्तन में ही सभी दिन भोजन करना होता है |थोडा मल -मूत्र का भी सेवन करना होता है |आसन को ही शैया बनाना होता है और उसे उठाना नहीं चाहिए |साधना स्थल के आसपास ही मल मूत्र का त्याग करना होता है |साधना काल में मल मूत्र की शंका हो तो भी न करे |शरीर पर थोडा मल मूत्र का लेपन करे |पिशाची अमावस्या को साधक के पास आएगी |भय दिखायेगी ,पत्नी भाव के लिए कहेगी ऐसे में साधक अपने विवेक से कार्य करे |इसके बाद शुक्ल पक्ष की दशमी तक स्नान ,मुख शोधन और ध्यानादि न करे |जूठी थाली में ही इस प्रकार २३ दिन भोजन करे |मल मूत्र को भोजन के पहले ही ग्रहण करे |शरीर की शुद्धि शुक्ल एकादशी से ही करे |शक्ति और गायत्री उपासना जीवन में फिर न करे |
विशेष चेतावनी

========== उपरोक्त साधना पद्धति मात्र जानकारी के उद्देश्य से दिया जा रहा है |जैसा की शास्त्रों में ,किताबों में कर्ण पिशाचिनी की साधना दी हुई है ,हम भी ब्लॉग और पेज पर मात्र जानकारी देने के उद्देश्य से इसे प्रकाशित कर रहे हैं |मात्र इस लेख के आधार पर साधना न करें |साधना पूर्व अपने गुरु से अनुमति लें और किसी सिद्ध काली साधक से सुरक्षा कवच बनवाकर जरुर धारण करें ,जो ऐसा हो की सुरक्षा भी करे औए पिशाचिनी के आगमन को रोके भी नहीं |योग्य ग्यानी से समस्त प्रक्रिया और मंत्रादी समझ लें ,जांच लें |किसी भी हानि अथवा परेशानी के लिए हम जिम्मेदार नहीं होंगे |धन्यवाद |...................................................................हर-हर महादेव 

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कर्ण पिशाचिनी [karn Pishachini ]

कर्ण पिशाचिनी [karn Pishachini ]
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भारतीय तंत्र में भूत -भविष्य और वर्तमान का हाल सटीक बताने वाली शक्ति में कर्ण पिशाचिनी का नाम मुख्या रूप से लिया जाता है |कहा जाता है की इस पिशाचिनी को सिद्ध करने पर साधक किसी भी व्यक्ति का भूत ,वर्तमान और भविष्य ठीक ठीक बता सकता है |यह पिशाचिनी स्वयं साधक के कर्ण या मष्तिष्क में सब डाल देती है |यह देवी योगमाया का ही एक अंश मानी गयी है |कर्ण पिशाचिनी का रूप एक तंदुरुस्त ,सुडौल ,सम्पूर्ण रूप से सांचे में ढली सर्वांग रूपसी की नग्नावृत्ति का है |इसकी सिद्धि कामभाव और रतिभाव से की जाती है अर्थात यह सुंदरी देवी ,साधक के भोग -भाव से प्रसन्न होती है |भूत भविष्य और वर्तमान कथन की इस सिद्धि को करने वाले साधक का अंत अच्छा नहीं होता है ऐसा अधिकतर मामलों में देखा गया है क्योकि इसकी अधिकतर पद्धतियों अघोरात्म्क और अपवित्र सी होती हैं |इसके साधक का अन्तकाल घोर दारिद्य और दुखद दशा में होता है |कहा जाता है की महान भविष्यवक्ता कीरो ने भारत आकर यह सिद्धि की थी और उसका अंतकाल इसी कारण अत्यंत दुखद रहा |यह वाम मार्गीय साधना आगे चलकर साधक का भविष्य नष्ट कर देती है और अंत में उसे दुर्गति और शारीरिक व्याधियों के साथ ही सामाजिक उपेक्षा का शिकार होना पड़ता है |कोई उसके पास भी नहीं जाना चाहता |कर्ण पिशाचिनी शरीर स्वस्थ रहने तक साथ होती है ,उसके बाद यह साधक को अपने अनुसार संचालित करती है |
कर्ण पिशाचिनी सिद्ध साधक किसी का चेहरा देखकर मन की बात सहित ,घर परिवार की सारी बातें बता देते हैं ,यहाँ तक की व्यक्तिगत जीवन के गूढ़ रहस्यों तक को बता कर लोगों को हैरान और चकित कर देते हैं |मन में सोचे प्रश्नों का कागज़ पर लिखाकर उत्तर दे देते हैं |सामान्य बुद्धि से यह बहुत बड़ा रहस्य और चमत्कार सा प्रतीत होता है |यह सारी स्थिति लोगों को चमत्कार सी लगती है |यदि कोई इनसे यह पूछता है की आपने यह सब कैसे बता दिया तो कहते हैं मेरा ज्योतिष ज्ञान श्रेष्ठ है ,मैंने सबकुछ शुद्ध गणना करके बताया है |कोई कहने लगता है मुझे अमुक देवी या देवता का ईष्ट सिद्ध है जिसकी शक्ति के द्वारा मैंने यह सब बताया है ,लेकिन ये सच्ची बात किसी को नहीं बताते हैं |ये कभी नहीं कहेंगे की इन्हें कर्ण पिशाचिनी सिद्ध है |
जिन लोगों को कर्ण पिशाचिनी की सिद्धि प्राप्त हो जाती है उनके पास धन और प्रसिद्धि की कमी नहीं रहती है ,लेकिन फिर भी इनके जीवन में सिद्धि के कारण कई कष्ट उत्पन्न हो जाते हैं और इनका जीवन सुखी नहीं रहता है |पिशाच प्रकृति की सिद्धि के प्रभाव के कारण ये स्वयं भी पिशाच बुद्धि ,स्वभाव और चरित्र के हो जाते हैं |कई दिनों तक स्नान नहीं करते |बढ़ चढ़कर बोलने और झूठ बोलने तक की आदत पद जाती है |दिखावे को यह भले ही साफ़ सुथरे कपडे पहनकर ,इत्र आदि लगाकर रहें पर इनके मन और शरीर की निर्मलता समाप्त हो जाती है |ये भक्ष्य -अभक्ष्य का भेद त्यागकर ,मांस मदिरा में लिप्त हो जाते हैं |पिशाच वर्गीय सिद्धि का अतिसम्पर्क इसके स्वभाव में भी क्रूरता और हिंसा उत्पन्न कर देता है |सिद्ध हो जाने पर कर्ण पिशाचिनी नियंत्रित तो हो जाती है पर उसका प्रभाव तो आ ही जाता है |कर्ण पिशाचिनी की सिद्धि के तरीके ही ऐसे हैं की व्यक्ति गन्दा और अशुद्ध हो ही जाता है |कुछ तरीके तो इतने अपवित्र हैं की सुनने मात्र से इनके पास जाने का मन न करे |
तंत्र शास्त्र में इस सिद्धि को कोई महत्त्व नहीं दिया जाता |तंत्र के अनुसार यह साधारण और निम्न कोटि की सिद्धि है |यह अधिकतर अघोरियों ,ग्रामीण साधको ,भौतिक लिप्सा में युक्त साधकों द्वारा की जाने वाली सिद्धि है ,जिसको करने पर उच्च देवी देवताओं की साधना तो दूर इस शक्ति के प्रभाव से निकलना भी मुश्किल हो जाता है और मोक्ष -मुक्ति कभी नहीं हो पाती |व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी आत्मा भी पिशाच लोक के अधीन हो जाती है |कर्ण पिशाचिनी के साधक को अपनी मुक्ति के लिए फिर कभी किसी अन्य उच्च शक्ति के साधक की सहायत लेनी होती है |इसके साधक की एकदम मुक्ति ही न हो ऐसा नहीं है किन्तु फिर या तो वह किसी की सहायता ले या सात्विक साधनाएं करे |कर्ण पिशाचिनी की कुछ साधनाएं सात्विक भी हैं जबकि मूल साधनाएँ वाम मार्गीय हैं |वाम मार्गीय या अघोर क्रिया वाले साधनाओं में मल या मूत्र की भिगाई रुई कान में लगातें हैं ,जबकि सात्विक क्रिया वाले अभिमंत्रित भस्म और केसर का लेप कान में लगाते हैं |सात्विक साधनाओं में समय अधिक लगता है और शक्ति भी देर से आती है ,चूंकि मूल स्वरुप और साधना परिकल्पना वाम मार्गीय रह है |यहाँ कहा जाता है की पिशाची १०००० मंत्र से ही सिद्ध हो जाती है ,परन्तु यदि कभी प्रयोग बंद कर दिया तो तो पुनः दुगने मंत्र जप करने पर ही सिद्ध होगी ,यदि फिर छोड़ दिया तो ४०००० पर सिद्ध होगी |कर्ण पिशाचिनी की साधना में मूर्ती और यन्त्र का उपयोग किया जाता है |इसका कोई चित्र उपलब्ध नहीं होता अतः चित्र नहीं रखा जाता |मूर्ती स्वयं निर्मित की जाती है ,यद्यपि यह आवश्यक नहीं और हर पद्धति में अलग अलग प्रक्रिया अपनाई जाती है |
इस शक्ति को पिशाचिनी का नाम दिया गया है ,क्योकि यह एक अति तामसी शक्ति है |इसे कर्ण के विशेषण से युक्त इसलिए किया गया है की साधक मन में जब कोई प्रश्न करता है तो उसके मन में ही उत्तर प्राप्त होता है ,किन्तु उसे अनुभूत होता है की यह शक्ति उसके कान में फुसफुसा रही है |इसलिए इसे कर्ण पिशाचिनी कहा जाता है |कर्ण पिशाचिनी की सिद्धि का दावा करने वाले अनेक तांत्रिक ,योगिराज और विभिन्न उपाधियों को धारण करने वाले महान सिद्ध पुरुषों के रूप में व्याख्या कर रहे लोग भारी भ्रम इसके बारे में फैला रहे हैं |इन लोगों के अनुसार कर्ण पिशाचिनी पूछे गए गोपनीय प्रश्न का उत्तर कान में बताती है |यह मनोवांछित वस्तु तुरंत लाकर देती है |यह साधक के साथ रतिक्रीड़ा करके उसकी कामवासना की भी पूर्ती करती है |लेकिन यह पूरी तरह सच नहीं है |इसमें केवल यह सच है की कर्ण पिशाचनी पूछे गए प्रश्न का उत्तर कान में बताती है |यह मोवान्छित वस्तु तुरंत लाकर नहीं देती है |इस प्रकार का कोई प्रदर्शन साधक द्वारा उसकी हाथ की सफाई अथवा जादूगरी होती है |कर्ण पिशाचिनी मानसिक शक्ति है जो जो अत्यंत निम्न स्तर की है और यह कुंडलिनी पर कोई प्रभाव नहीं डाल सकती जबकि बिन कुंडलिनी शक्ति के चक्रों से सम्बंधित शक्तियों के कोई वस्तु वस्तु ला पाना कठिन है |यह संभव है की उच्च अवस्था के साधक द्वारा नियंत्रित पिशाचिनी ,प्रेत शक्तियों द्वारा यह कार्य करवा ले ,किन्तु यह अति उच्च अवस्था में ही सम्भव है |
कर्ण पिशाचिनी साधक के साथ रतिक्रीड़ा करके उसकी कामवासना की तृप्ति भौतिक स्तर पर नहीं करती |यह रति अघोरपंथ की मानसिक रति होती है |इस तकनीक का प्रयोग कर्ण पिशाचिनी की शक्ति को शशक्त करने के लिए किया जाता है ,जिसमे तकनिकी ज्ञान चाहिए होता है |यह एक विशेष प्रकार की रति है ,जिसमे चरम सुख या स्खलन जैसी क्रिया नहीं होती |यदि यह हुई तो साधक की शक्ति जाती रहती है |उसे नए सिरे से सिद्धि करनी होती है |कर्ण पिशाचिनी भूत काल और वर्तमान की बात पूरी तरह सही सही बताती है |आय के स्रोत में वृद्धि कर सकती है ,परन्तु भविष्य का कथन इसके द्वारा हमेशा सही नहीं होता ,क्योकि इसकी गति भविष्य में नहीं है |भविष्य कथन साधक का अनुमान या ज्योतिष ज्ञान होता है |यह किसी विशेष शक्ति के साधक का भूत काल भी सही नहीं बता पाती |आप दुर्गा सप्तशती में से कवच का पाठ करने के बाद अपनी जेब में किसी वस्तु को रखें और पुनः कवच का पाठ करके पिशाची साधक के पास जाएँ तो वह उस वस्तु के बारे में सही नहीं बता पायेगा |पिशाची विशिष्ट साधक के सामने पूर्ण रूप से न आने के कारण केवल अपने साधक को दूर से ही वार्ता संकेत देती है |उसे पूर्ण रूप से समझने में अक्षम होने के कारण उसका फलित गलत हो जाता है |
कर्ण पिशाचिनी मूलतः वाम मार्ग की शक्ति है ,जो अधिकतर सिद्धों ,नाथों द्वारा सिद्ध की जाती है |इसकी परिकल्पना भी नाथ पंथ से प्रेरित है |इसे देवी कहना उपयुक्त नहीं है ,क्योकि इसका भाव समीकरण देवी जैसा नहीं है ||यह एक तामसी शक्ति है |इसकी सिद्धि भी इसी प्रकार करनी चाहिए |इसमें किसी पवित्र या सौम्य भाव की छाया पड़ते ही यह गायब हो जाती है |यह पवित्र भाव ,पवित्र स्थान ,साफ़ सुथरे वातावरण में सिद्ध नहीं होती |मंदिर ,पूजा -स्थल ,नदी का मनोरम किनारा ,सुगन्धित फूलों का बाग़ ,स्वच्छ स्थान पर इसे सिद्ध नहीं किया जा सकता |यह विद्या शक्ति उपासक या दुर्गा पाठी को आसानी से सिद्ध नहीं होती |कई कर्ण पिशाचिनी वर मांगती हैं की मुझे तुम किस रूप में चाहते  हो -माँ ,पुत्री ,बहन ,स्त्री या प्रेमिका |आप इसमें से जिस रूप को स्वीकार करोगे ,उस स्त्री की परिवार में हानि हो जायेगी |यदि माँ रूप में माना तो माँ की हानि हो जायेगी |कभी कभी यह विशेष लावण्य रूप को ग्रहण करती है ,अतः माँ -बहन रूप में मानते मानते पत्नी भाव को प्राप्त करने की इच्छा होने लगती है |ऐसी स्थिति में साधक का पतन हो जाता है |बहन रूप में मानते मानते पत्नी रूप मानने पर गृहस्थ से नाता टूट जाता है |पत्नी को कष्ट होता है और साधक तथा उसकी पत्नी साथ नहीं रह पाते |अतः कर्ण पिशाचिनी की साधना बहुत सोच समझकर ही करनी चाहिए |इस प्रकार की किसी साधना को कमजोर हृहय वालों को नहीं करना चाहिए क्योकि साधना अवधि में पिशाचिनी भयात्म्क वातावरण भी उत्पन्न करती है और किसी गलती पर भारी विपत्ति और कष्ट भी उत्पन्न करती है |

साधक के सामने सिद्धि के समय यह एक साधारण श्याम वर्ण की युवती के रूप में प्रकट होती है |इसकी मुखाकृति तेजस्वी लगती है और यह अलंकार रहित होती है |शरीर पर कोई आभूषण नहीं होता है |मस्तक में एक देदीप्यमान प्रकाश किरने छोड़ता हुआ आड़ा नेत्र होता है |इसकी ओर देख पाना संभव नहीं होता है |ललाट में यह देदीप्यमान आड़ा नेत्र ही कर्ण पिशाचिनी की पहचान है |इसके पीछे मृत आत्माओं की भीड़ होती है किन्तु यह सब साधक को भयभीत करने का प्रयास नहीं करते |प्रकट होने पर कर्ण पिशाचिनी साधक के मस्तक पर हाथ रखती है |यह समय ही साधक की कठिन परीक्षा का समय होता है |इस समय उसे भयभीत करने वाला कोई दृश्य तो नहीं दिखाई देता है किन्तु कर्ण पिशाचिनी का प्रथम स्पर्स ही भय से संज्ञा शून्य करने वाला तथा साधक को विचलित करने वाला होता है |उस समय साधक साहसपूर्वक इसके प्रश्न का उत्तर देकर इसे वशीभूत कर साथ रहने के लिए वचन बढ कर लेता है |यह स्थिति इसकी सिद्धि की द्योतक मानी जाती है |................................................................हर-हर महादेव 

विशेष - किसी विशिष्ट समस्या ,तंत्र -मंत्र -किये -कराये -काले जादू -अभिचार ,नकारात्मक ऊर्जा प्रभाव आदि पर परामर्श /समाधान हेतु संपर्क करें -मो. 07408987716 ,समय -सायंकाल 5 से 7 बजे के बीच . 

लीलावती अप्सरा साधना [[ Lilavati Apsara Sadhna ]]

लीलावती अप्सरा साधना [[ Lilavati Apsara Sadhna ]]
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अप्सराएं प्रकृति की ऊर्जा शक्तियाँ हैं जिनके गुणों के आधार पर इनके नाम और प्रसिद्धि हैं |यह देवताओं की सहायक शक्तियाँ हैं जो योगिनियों ,भैरवों के स्तर के नीचे की शक्तियाँ हैं और पृथ्वी तथा स्वर्ग के देवताओं के बीच समान सम्बन्ध रख सकती हैं |मुख्य अप्सराओं के अतिरिक्त अनेक अप्सराएं भी हैं जो अलग अलग गुणों के कारण भिन्न कार्य सम्पन्न करती हैं |लीलावती अप्सरा भी इनमे से ही एक है |इनकी प्रकृति प्रेम -सौहार्द्र और शान्ति की है |जिस व्यक्ति के वैवाहिक, पारिवारिक, सामाजिक जीवन में क्लेश तनाव की स्थिति उत्पन्न हो, इस साधना के प्रभाव से उनके वैवाहिक, पारिवारिक सामाजिक जीवन में प्रेम सौहार्द की स्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं यह एक विशेष साधना है,जिसको सिर्फ चंद्रग्रहण पर ही शुरू किया जा सकता है |लीलावती साधना करने से जीवन मेँ प्रेम सौँदर्य रस और अंनद प्राप्त होता है।कितने ही रुषि ,राजा , तांत्रिक वेदिक काल से ही ऐसी साधना करते रहे है और इनका उल्लेख हमारे शास्त्रों में मिलता है |
विधी:-
सिद्धी के बाद लीलावती अप्सरा को जब भी बुलाना है तो बस 21 ,11 बार मंत्र जाप कर ले वह तुरन्त आपके सामने होगी।एक बात चद्रग्रहण आरंभ के समय मंत्र जाप किया जाए तो चंद्रग्रहण खातम होते होते अपसरा दर्शन देगी।
गुलाब का दो माला,मिठाई और कुछ फल अप्सरा चित्र के सामने रख कर प्रतिदिन साधना करे।अगर प्रतिदिन दस हजार जाप किया जाए तो साधना 21 दिन के अंदर पुर्ण हो जाता है।
मंत्र - ।। हूं हूं लीलावती कामेश्वरी अप्सरा प्रत्यक्षं सिद्धि हूं हूं फट् ।।


विशेष - शेष समस्त विधि तिलोत्तमा अप्सरा साधना अनुसार ग्रहण करें |साधना पूर्व योग्य ज्ञानी से समस्त प्रक्रिया समझ लें |गुरु से अनुमति प्राप्त कर लें और सुरक्षा कवच अवश्य धारण कर ही साधना में प्रवृत्त हों |मात्र लेख देखकर साधना करने न बैठें |किसी अप्रिय स्थिति के लिए हम जिम्मेदार नहीं ,हमारा उद्देश्य मात्र जानकारी उपलब्ध कराना है |...........................................................हर -हर महादेव 

विशेष - किसी विशिष्ट समस्या ,तंत्र -मंत्र -किये -कराये -काले जादू -अभिचार ,नकारात्मक ऊर्जा प्रभाव आदि पर परामर्श /समाधान हेतु संपर्क करें -मो. 07408987716 ,समय -सायंकाल 5 से 7 बजे के बीच .